हरियाणा पर्यावरण विभाग की अनिमिताओं के संबंध में डेढ़ वर्ष पहले जारी हुए थे आदेश
गलत जानकारी देकर और रिकार्ड में हेर-फेर कर उड़ाया जा रहा है आरटीआई एक्ट का मजाक
चंडीगढ़़, 3 फरवरी (अनिल लाम्बा) : हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंद्र सिंह हुड्डा और पर्यावरण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने इसी विभाग के निर्देशक राजीव रंजन को पर्यावरण विभाग में हुई अनिमिताओं के मामले में जांच कर अपनी रिर्पोट देने के लिए कहा था, परन्तु अब डेढ़ वर्ष बाद संबंधित अधिकारियों का कहना है कि उन्हें ऐसा कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ। ऐसे में जांच कर रिपोर्ट देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। इससे महज अंदाजा लगाया जा सकता है कि संबंधित अधिकारियों के लिए मुख्यमंत्री के आदेश क्या मायने रखते हैं? आरटीआई कार्यकत्र्ता डा. राजिन्द्र कुमार सिंगला ने आरटीआई एक्ट के तहत प्राप्त दस्तावेजो से अगस्त, 2012 में खुलासा किया था कि हरियाणा के पर्यावरण विभाग में न केवल की गई नियुक्तियों व पदोन्नतियों में नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं, बल्कि सूचना के अधिकार कानून के तहत दिए गए दस्तावेजों में भी हेर-फेर की गई है। यह मामला मीडिया में आने के बाद मुख्यमंत्री भूपिंद्र सिंह हुड्डा ने 23 अगस्त, 2012 को निर्देशक राजीव रंजन को जांच के आदेश दिए थे। इसके बाद 7 सितंबर, 2012 को पर्यावरण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने भी निर्देशक को जांच कर रिपोर्ट करने के लिए लिखित आदेश दिए थे। निर्देशक राजीव रंजन ने भी उक्त मामले में आश्वासन दिया था कि उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एक पैनल का गठन कर दिया है। डेढ़ वर्ष बाद जब उक्त मामले में कोई कार्यवाई नहीं हुई तो डा. सिंगला द्वारा 2 दिसंबर, 2013 को दोबारा आरटीआई आवेदन दायर कर जांच की प्रगति रिपोर्ट जानने का प्रयास किया गया। निर्देशक के अधीनस्थ कार्यरत जन सूचना अधिकारी राधे श्याम शर्मा, जोकि स्वंय इस घपले में संलिप्त है, ने सूचना अधिकार के तहत बताया कि उनके विभाग को अभी तक मुख्यमंत्री का ऐसा कोई आदेश ही प्राप्त नहीं हुआ। जबकि दूसरी ओर डा. सिंगला का दावा है कि उनके पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 13 सितंबर, 2012 को ही अतिरिक्त मुख्य सचिव के आदेश संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखे गए थे।
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हरियाणा पर्यावरण विभाग में भारी अनिमिताएं
पर्यावरण प्रबंधन के 7 वर्ष के अनिवार्य अनुभव को नजर अंदाज करते हुए शुभकिरन शर्मा और राधे श्याम शर्मा को वैज्ञानिक ग्रेड-1 के पद पर नियुक्त कर दिया गया था। इन नियुक्तिओं के लिए जरुरी मंत्रीपरिषद की अनुमति भी नहीं ली गई। नियुक्ति के 4 माह के अंदर हरियाणा लोक सेवा आयोग से ली जाने वाली मंजूरी को भी नजर अंदाज कर दिया गया। यहां तक कि 55 से 58 वर्ष हेतु सेवा विस्तार के लिए अनिवार्य स्वीकृति लिए बिना ही वैज्ञानिक शुभ किरन शर्मा को 58 वर्ष बाद सेवानिवृत्त कर दिया गया। पर्यावरण विभाग के संयुक्त निदेशक ए. के. मेहता द्वारा लिखित तौर पर इस बात को स्वीकार भी किया गया है कि दोनो वैज्ञानिक शुभकिरन शर्मा और राधे श्याम शर्मा सेवानियमों पर खरे नहीं उतरते।निर्धारित सेवानियमों के अनुसार ग्रुप-सी के 12 स्वीकृत पदो पर 20 प्रतिशत पदोन्नती के अनुसार मात्र 2 या 3 कर्मचारी पदोन्नती के हकदार थे, जबकि संबंधित अधिकारियों ने 8 कर्मचारियों को पदोन्नत कर दिया, वह भी बिना किसी वरिष्ठता सूची के अनुसार। नियमों के अनुसार एक कर्मचारी ए.सी.पी. अथवा पदोन्नति दोनों में से किसी एक का हकदार होता है, जबकि पर्यावरण विभाग ने वर्ष 2009-10 में मुकेश कुमार बहल को न केवल कनिष्ठ वैज्ञानिक सहायक से वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर पदोन्नत कर दिया, बल्कि ए.सी.पी का लाभ भी दे दिया गया। जिस कारण सरकारी खजाने को नुक्सान
हुआ। राज्य सूचना अधिकारी ने अपने जवाब में यह स्वीकार किया है कि आरटीआई एक्ट के तहत उपलब्ध करवाए गए दस्तावेजों में जो हेरा-फेरी की गई थी, उसको पर्यावरण विभाग में तैनात सहायक जगदीश ठाकुर द्वारा अंजाम दिया गया था। परन्तु उक्त कर्मचारी के विरुद्व भी अभी तक किसी प्रकार की कोई कार्यवाई नहीं की गई।

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